संकट के दौर में जनजातीय धर्म और परम्पराएँ

 

प्रियांकी गजभिये

सहायक प्राध्यापक (इतिहास विभाग), शास. बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्नातकोततर महाविद्यालय, डोंगरगॉव, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़, भारत।

*Corresponding Author E-mail: priyankirjn7910@gmail.com

 

ABSTRACT:

“सरल होना कठिन है“ यह युक्ति आदिम समुदायों पर यथोचित लागू होती है। उनका प्रकृति से एक आध्यात्मिक  जुड़ाव और उनकी मान्यताओं के अनुरुप पराशक्तियों से उनका सीधा सम्पर्क जनजातियों का प्रकृति के साथ एक सतत् संवाद और तादात्म्य स्थापित करता है। और यही उनकी सरलता का आधार है। सरल समाजों की समस्त सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ उनकी धार्मिक मान्यताओं के इर्द-गिर्द ही निहित है। जनजातियों की धार्मिक संस्थाएँ उनके लिए पूजा-पाठ मात्र का केन्द्र नहीं है अपितु वह उनकी संपूर्ण जीवन शैली को ही संचालित करती है।1 आदिम समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ भी उनकी धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं की ही संवाहक है। परन्तु वर्तमान परिदृश्य में उनकी धार्मिक और सामाजिक संस्थाएँ एक भयानक संकट के दौर से गुजर रही है।2 सरल समाजों के लिए यह संकट इतना भारी है कि जनजातियों की पहचान और उनकी जनजातीय विशिष्टताएँ तेजी से विलुप्तता की ओर अग्रसर हैं। इस गहराते संकट से आदिवासी समाज तो जूझ ही रहा है, सरकार शासन और प्रशासन के लिए भी यह एक चुनौति है। राष्ट्रीय परिदृश्य में ऐसे सरल समाजों जिनके जीवन में पवित्रता, सरलता और भोलापन ही जीवन का विधायक प्रतिमान हो, ऐसे सरल समुदायों का अनुरक्षण करना किसी भी राष्ट्र के लिए एक नैतिक जिम्मेदारी होना चाहिए।

 

KEYWORDS: ट्राइब, आदिवासी, टैबू, टोटम, बोंगा, शमन, सरना, बैंगा, ओझा, घोटूल, धुमकुरिया, लिंगोपेन

 

 


प्रस्तावना:-

सरल और आदिम समूहों को समझने के लिए उन समुदायों की धार्मिक मान्यताएँ व परम्पराएँ समाज शास्त्रियों और मानव वैज्ञानिकों के लिए सर्वदा अध्ययन का केन्द्र रही है। न सिर्फ नृशंस वैज्ञानिक या समाजशास्त्री अपितु दार्शनिकों और इतिहासकारों को भी मानव विकास की क्रमिक सामाजिक-सांस्कृतिक कड़ियों को जोडनें के लिए एक व्यापक अध्ययन क्षेत्र उपलब्ध कराया है। यही कारण है कि लॉक, रुसो, हॉब्स, हर्बर्ट स्पेन्सर, दुर्खीम व बर्गसाँ जैसे ख्यातिलब्ध सामाजिक, राजनीतिक, और नैतिक दार्शनिकों की गहरी रुचि सरल समाजों की सामाजिक सांस्कृतिक मान्यताओं और परम्पराओं पर केन्द्रित रही है।3

 

जब आधुनिक और जटिल समाज ने अपनी आवश्यकताओं और निर्भरताओं की पूर्ति के लिए जंगल का रुख किया तो केवल संशाधनों का ही दोहन नहीं हुआ बल्कि तथाकथित आधुनिक समाज की आवश्यकताओं की आपूर्ति आदिम और सरल समाजों को अपनी पारम्परिक मान्यताएँ और धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थानों की “बली“ चढ़ाकर करनी पड़ी। जो आदिम विशिष्टताएँ और पहचान आदिवासियों को उनकी  धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से प्राप्त होती है, वर्तमान परिदृश्य में वे समस्त सामाजिक, संस्कृतिक, धार्मिक मान्यताएँ और परम्पराएँ घोर संकट के संक्रमण दौर का सामना कर रही अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। जनजजातियों की सामाजिक, सांस्कृतिक व शिक्षा के केन्द्र युवागृहों का विलुप्त होना इसका ज्वलंत उदाहरण है।4

 

विश्व में अफ्रीका के पश्चात् भारत में ही सर्वाधिक जनजातीय समूह निवास करता है। जनगणना के आकड़ों में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत कुल जनसंख्या में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 10,42,81034 है। जो भारत की कुल जनसुख्या का 8.6 प्रतिशत है। रहन-सहन, बोली-भाषा और इनमें समूहों के रीति-रिवाज और मान्यताओं को लेकर अनेक विविधताएं हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार अधिसूचित समूहों की कुल संख्या 705 है। जबकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में लगभग 220 जनजातीय समूह समूह चिन्हांकित किए गए है और लगभग उतनी ही संख्या में उनकी भाषा और बोलियां भी है।5

 

राष्ट्रीय परिदृश्य में एकांत सुदुर और विषम जंगली दुर्लभ परिस्थितियों में आत्मनिर्भर जीवन व्यतीत करने वाली इन जनजातियों का अधिकांश भाग भारत के छः राज्यों महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, आंध्रप्रदेश (तेलंगाना) व तामिलनाडू में संकेन्द्रित है।

 

भारत की जनजातियों की परम्परागत धार्मिक संस्थाओं को सर्वाधिक क्षति अंग्रेजों के आगमन पश्चात् ईसाई मिश्नरियों ने पहुंचाया। “वेरीयर एल्विन“ की “राष्ट्रीय उपवन“ नीति ने भारतीय जनजातियों को विकास की धारा से ही पृथक कर दिया और उन्हें जंगली जानवरों की तरह प्रदर्शनी और नुमाइश की वस्तु के रूप में एक चिड़िया घर में बदल दिया।6 आदिवासियों के दोहन और शोषण की महाविनाश लीला तब और अधिक विकराल हो गई जब भूखे भेड़ियों की तरह साहूकारों और बिचोलियों के लिए जंगलों के रास्ते खोल दिए गए।

 

साहूकारों और बिचौलियों के जंगलों में प्रवेश से आदिवासियों में प्रचलित वस्तु विनिमय प्रणाली का स्थान मुद्रा अर्थव्यवस्था ने ले लिया। परिणाम स्वरुप उनकी सरल वस्तु विनिमय व्यवस्था चरमरा गई और वे ऋण ग्रस्तता के शिकार होने लगे।7 भोले-भाले और सरल आदिवासियों को साहूकारों (महाजनों) ने अपने जाल में फंसाकर उनकी सरल अर्थव्यवस्था व उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की पवित्रता पर अतिक्रमण कर आदिवासियों का मानसिक और शारीरिक शोषण करना शुरू कर दिया।

 

समस्या इतनी विकराल थी कि सरकार को संपूर्ण देश में जन जातियों पर साहूकारों और महाजनों के इस प्रभावों का विश्लेषण करने एक उप समिति (वर्णित क्षेत्र आसाम को छोड़कर) बनानी पड़ी। जिसने इस समस्या का अध्ययन कर साहूकारों (महाजनों) द्वारा जनजातियों पर किए जाने वाले शोषण की रोकथाम के लिए सुझाव दिए। समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि –

 

“हम यह आवश्यक समझते हैं कि वर्जित क्षेत्रों में साहूकारी का अनुमति देनी ही नहीं चाहिए और उन्हें अनुमति यदि किसी कारण से देनी ही है तो उन्हें लाइसेंस व केवल कड़े नियंत्रण के तहत् ही कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए।“8

 

उद्देश्य-

जनजातीय धर्म और उनकी परम्पराओं का अध्ययन करना। उन कारकों की पड़ताल करना जो वर्तमान में जनजातियों की धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए संकट बने हुए है तथा जनजातियों की परम्परागत विरासतों को विलुप्तता की ओर धकेल रहे है।

 

परिकल्पना -

जनजातीय समूहों में धर्म उन्हें संचालित करने वाली शक्ति का वह स्त्रोत है जो समूचे समूह को नियंत्रित करता है। जनजातियों में धर्म और परम्पराओं के प्रति आस्था बनाए रखने वाले जनतानियों की सामाजिक- सांस्कृतिक संस्थाएँ, गैर आदिवासी सम्पर्क, परसंस्कृतिग्रहण, नगरीयकरण, औद्योगिकीकरण के प्रभाव में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।

 

शोध प्रविधि-

यह शोध अध्ययन मानवशास्त्रीय एवं समाजशास्त्रीय मौलिक स्त्रोतों पर आधारित विवरणात्मक प्रकृति का है। यह जनजातीय मानव विज्ञान के मौलिक द्वितीयक स्त्रोतों पर आधारित है। शोधार्थी द्वारा नए विचारों को भी अपने शोध निष्कर्ष में सम्मिलित किया है।

 

जनजातीय ऐतिहासिक यात्रा-

भारत विभिन्न प्रजातियों और जनजातियों के लिए विभिन्न संस्कृतियों और विचारधाराओं का मिलन स्थल रहा है। प्रजातियों के साथ की विभिन्न संस्कृतियों का सम्मिश्रण यहां इतना अधिक घुल-मिल गया है कि किसी एक संस्कृति का कालानुक्रम और उनके प्रजातिय तत्वों के सिरे खोज पाना बहुत ही दुसाध्य कार्य है। भारतीय मानव शास्त्रियों में सर्वश्री रिज्ले, गुहा और मजूमदार आदि इस क्षेत्र में वृहद कार्य किया परिणाम स्वरूप बहुत हद तक अब यह तथ्य स्थापित है कि भारत के आदिवासी समुह अधिकांशतः उत्तर प्रागैतिहासिक समूहों के उत्तरजीवी अवशिष्ट हैं।9 ऋग्वैदीक काल (2000 से 1000 ई.पू.) में भारत की जनजातियाँ आर्यों के आगमन और उनके आक्रमणों का साक्षी रही हैं। फुकस (1973) के अनुसार “आर्यों के आक्रमण तक का इतिहास अस्पष्टता व दुर्बोधता से आच्छादित है।

 

ऋग्वेद्र में असुरों के रूप में दस्युओं और सम्युओं का इन्द्र के साथ युद्ध और उनके दुर्गों का नष्ट कर वध करने का उल्लेख मिलता है। सरस्वती, परुश्नी नदी के किनारे बसने वाली “पर्वता जनजाति“ को इन्द्र द्वारा मार डालने और सम्वराओं के दुर्गों को नष्ट करने का भी जिक्र मिलता है।

 

कुँवर सुरेश सिंह (1964) ने टिप्पणी की है कि भारतीय जनजातियाँ सभ्यता की अनुवर्ती होकर निष्क्रिय नहीं बनी रहीं बल्कि इतिहास की “स्थिरता तथा गतिशीलता के प्रति प्रतिक्रियाएँ भी व्यक्त कीं“। उनकी भूमिका प्राचीन ग्रन्थों में आये सौरसों, किन्नरों तथा किरातों जैसे सन्दर्भों तक ही सीमित नहीं है। यह उपमहाद्वीप में प्रजातियों तथा संस्कृतियों के संयोजन की प्रक्रिया, हिन्दू धर्म की विवृद्धि तथा उसकी दंतकथाओं तथा मिथकों, जादू तथा धर्म, परम्पराओं तथा प्रथाओं के रवा हीन (अक्रिस्टलीय) पुंज का अंग है।10

 

महाकाव्य काल (रामायण तथा महाभारत) में विभिन्न जनजातियों में शुद्र, अभीर, द्रविड़, पुलिन्द, शवरा अथवा सौर का संदर्भ आता है। राम को फल भेंट करने वाली “शवरी“ का आरंभिक संदर्भ “ऐतरेय ब्राम्हण“ में खोजा जा सकता है। वेरियर एलविन के शब्दों में “शवरी ऐसे योगदानों का एक ऐसा प्रतीक वन चुकी है कि जनजातियाँ भारत के जीवन का निर्माण कर सकती हैं और करेंगी।“11

 

महाभारत और अनेक दंत कथाओं में एक आदर्श शिष्य के रूप में भील जनजाति का एक महान धनुर्धर “एकलव्य“ का नाम दर्ज है। महाभारत के युद्ध में “मुण्डा“ और “नागा“ जनजातियों ने कौरवों के साथ पाण्डवों के विरूद्ध युद्ध में हिस्सा लिया था। असाधारण योद्धा “घटोत्कच“ भीम की जनजातीय पत्नी से जन्मा था। अर्जुन ने एक नागा राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था। वर्णित मिथक नागाओं का हिन्दू संस्कृति में संविलियन हो गया है। नागालैण्ड के नगाओं से उनका कोई संबंध नहीं है। “बुद्ध“ ने भी कुछ नागाओं को धम्म दीक्षा दिलाई थी।

 

अजात शत्रु ने वैशाली जनजाति गणराज्य को नष्ट कर दिया। सिकंदर द्वारा उत्तर पश्चिमी सीमा जनजातियों को रौंद डाला। अर्थशास्त्र में सिकंदर का विरोध करने वाली शक्तिशाली जनजाति “अतविक“ का सन्दर्भ आता है। महान सम्राट अशोक द्वारा भी अपने राज्य में वन्य जनजातियों को शरण देने का वर्णन मिलता है।

 

मध्य कालीन भारत में 12वी से 18वी शताब्दी में तुर्क, अफगानी तथा मुगल शासकों ने विभिन्न जनजातियों के मुखियाओं से अपने पक्ष में औपचारिक निष्ठा की मांग की। 1858 तथा 1616 ईस्वी में मुसलमान सेनाओं ने छोटा नागपुर के क्षेत्र में प्रवेश किया तथा खुकरा के राजा को अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार असम के जनजातीय क्षेत्र मुसलमान शासकों के अधीन आ गए। 1661 में दाऊद खां ने चेरों को अपने अधीन कर लिया और इसी काल में उत्तर पश्चिम सीमा की कुछ जनजातियों का इस्लाम धर्म में धर्मान्तर हुआ। पीर सैयद शाह कमाल और पीर सैयद मुहम्मद जैसे मुसलमान धर्म गुरुओं का नाम उस काल में नरों और कोलों के बीच धर्म प्रचार के लिए आता है।

 

भक्ति आन्दोलन जैसे हिन्दूधर्म की कतिपय धाराओं ने भी मुण्डा तथा ओराव जैसी जनजातियों को प्रभावित किया। चैतन्य महापभु झारखण्ड से गुजरे और मुण्डा क्षेत्र में कार्य करते हुए बिनन्ददास जैसे वैष्णव प्रचारकों ने बहुत सी जनजातियों का धर्मांन्तरण किया। “भुइया लोगों का पूर्णरूपेण हिन्दुकरण हो गया तथा उन्होंने अपनी सभी जनजातीय विशेषताओं को खो दिया।“12 जनजातियों में अनुवर्ती भक्ति आन्दोलन की जड़ों का वैष्णव प्रभाव में खोजा जा सकता है। असम में अहामों के धर्मान्तरण से अधिक स्पष्ट उदाहरण और कोई नहीं है (सुरेश सिंह, 1964)।

 

अंग्रेजों के आगमन के बाद भारत में अंग्रेज उपनिवेशवादी अपनी आधुनिक प्रौद्योगिकी, नवीन उपागम तथा निहित स्वार्थों के साथ प्रकट हुए। अँग्रेजी शासन के उद्भव का अर्थ जनजातीय क्षेत्रों का समुद्री किनारों तथा बिहार तथा बंगाल में प्रवेश था। जनजातीय टुकड़ियों के बीच से ग्राण्ड ट्रंक रोड के निर्माण ने बाहर से व्यापारियों, साहूकारों, तथा भूमि पर कब्जा करने वाले गैर आदिवासियों के प्रभाव में तेजी ला दी।

 

भारतीय जनजातियों की इस ऐतिहासिक यात्रा में एक दूसरा अत्यन्त उल्लेखनीय व ध्यान देने योग्य विन्दु भारत के तीन बड़े धर्मों का स्थान है, जहाँ एक ओर हिन्दू तथा इस्लाम धर्म अधिकतर कगार पर ही रुक गए, अधिकांश मामलों में ईसाई सम्प्रदाय के लोग ब्रिटिश शासकों की संरक्षता में जनजातीय क्षेत्रों में बहुत अन्दर तक प्रवेश कर गए।

 

जनजातीय धर्म, विश्वास और परम्पराएँ-

एक जनजाति अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की समृद्ध विरासत के साथ स्वयं में एक परिपूर्ण और आत्मनिर्भर इकाई है।13 जनजातीय समूह की समस्त गतिविधियाँ, धार्मिक संस्कारों से ही संचलित होती है। उनकी धार्मिक संस्था के प्रति आस्था किसी न किसी रूप में प्रकृति से जुड़ी हुई होती है। संपूर्ण समूह का धार्मिक प्रतीकों के साथ व्यक्तिगत जुडाव उनकी आपसी संगठन शक्ति को प्रगाढ़ता और मजबूती प्रदान करता है। किसी टोटम के प्रति उनकी धार्मिक मान्यताएँ चाहे वे सकारात्मक व्यवहार वाली हो या “टेबू“ के रूप में निषेधात्मक व्यवहार वाली, दोनों ही क्रियाएँ प्रकृति का संरक्षण ही करती हैं और प्रकृति के साथ उनका यही सहजीवी तालमेल के कारण ही जनजातियों ने हजारों वर्षों से दुर्गम पहाड़ी और जंगलों में अपना अस्तित्व बनाए रखा है।

 

जनजातियों के पारंपरिक शिक्षा केन्द्रों का विलुप्तिकरण-

युवा गृह प्रत्येक जनजाति का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था रही है। विश्व के सभी आदिम समाजों का यह अभिन्न अंग रही है।14 अलग-अलग जनजातियों में इनके नामकरण भिन्न-भिन्न मिलते है। युवा गृह जनजातियों के शिक्षा व जनजातीय संस्कृति के प्रशिक्षण का एक केन्द्र है, जो धीरे-धीरे विलुप्तता के कगार पर है या कही यह पूर्णतः लुप्त भी हो चुका है।

 

मजूमदार (1967) जनजातीय भारत में युवागृहों का विवरण देते हुए कहते हैं कि उभयलिंगी और एकलिंगी युवागृह देश के उन सभी भागों में पाये जाते हैं जहाँ जनजातीय लोग बसते हैं। वे असम में पाये जाते हैं। कोंयाक नागा बालकों के युवागृह को “बान“ नाम से पुकारते हैं तथा बालिका युवा गृह को “यो“ कहते हैं। ओओ नागा इसके “अरीचू“ तथा “मेमिस“ दो नामों का प्रयोग करते हैं। पुरुषों के युवागृह को “इकूची“ तथा महिलाओं के युवागृह को “इलोइची“ कहते हैं। अंगामी नागा इसे किचूकी पुकारते हैं। उत्तरी उत्तर प्रदेश के निचले हिमालय क्षेत्र के भोटिया लोगों में भी युवागृह पाये जाते हैं जो इसे रंगाँग कहते हैं। छोटा नागपुर की मुण्डा तथा “हो“ जनजातियाँ भी इसे रखती हैं तथा इसे “गिटिओरा“ नाम से पुकारती हैं। ओराँव लोग इसे “जोन्करपा“ अथवा “घुमकुरिया“ कहते है और भुझ्ंया उसे “धांगरबासा“ और गोंड़ इसे “गोटुल“ कहते हैं।15 मजूमदार प्रस्तुत करते हैं कि इन आवासों के अन्तनिश्चित, गहन, सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक प्रयोजन हैं। वरिष्ठ लोग जो जनजातीय संस्कृति तथा परम्परा में पारंगत होते हैं, जो वह सीख चुके हैं तथा अनुभव किया है, कनिष्ठ को स्थानान्तरित कर देते हैं।

 

प्रसिद्ध मानवशास्त्री सर्वश्री एस. सी. रॉय छोटा नागपुर के ओरॉव जनजाति के युवा गृह पर उल्लेखनीय कार्य किया है। उन्होंने युवागृह के महत्व को रेखांकित महत्व को करते हुए इसके उद्देश्यों को उजागर किया। उन्होनें स्पष्ट किया कि युवागृह आर्थिक संगठन, धार्मिक-सामाजिक कर्तव्य एवं प्रशिक्षण तथा आखेट गतिविधियों, सन्तति जनन एवं संवर्धन, जादुयी-धार्मिक सांस्कृतिक अनुष्ठानों व समारोहों को विधिपूर्वक सम्पन्न कराने की समृद्ध और व्यवस्थित प्रशिक्षण देने वाली समृद्ध संस्थागत अध्ययन-प्रयोगशाला है।16 यह परसंस्कृति ग्रहण, नगरीकरण, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और विस्थापन के कारण निरंतर विलुप्त हो रही है। बारम्बार तथा शहरी जीवन पद्धति के गहरे सम्पर्क के फलस्वरूप उनमें अपनी प्रारम्भिक जीवन पद्धति के प्रति प्रेम तथा विश्वास में कमी आयी हैं। इस प्रकार स्कूल जाने वाले बालक न केवल युवागृह में जाना त्याग रहे हैं, अपितु वास्तव में वहाँ जाना बन्द कर देते हैं। ऐसा पाया गया है कि “हो“ जनजाति शहरी अभिकरण से गहरे सम्पर्कों के कारण “गिटिओरा“, जो उनकी युवागृह संस्था है, के अस्तित्व को नकारते हैं।17 ईसाई धर्म के प्रचार ने भी अपनी भूमिका निभाई है। मध्य भारत तथा उत्तर पूर्वी क्षेत्र में सभी जनजातियों का, जिनका धर्मान्तरण ईसाई धर्म में हुआ है मिशनरियों द्वारा युवागृह की संस्था को नष्ट करने के लिये “बलात“ मत प्रवर्तन किया गया है। इन जनजातीय लोगों को युवागृह में जाने की अनुमति नहीं दी जाती है। इस प्रकार के संगठित एवं नियमित प्रयास का परिणाम है कि, ईसाई जनजातीय ग्रामों से युवागृह गायब हो गये हैं।18

 

आत्मा एवं मानावाद -

आदिम मानव समूह प्रकृति के सीधे संपर्क में वास करते है। वे प्रकृति में घटने वाली प्राकृतिक घटनाओं से प्रभावित भी होते है। जब वे प्रकृति की उन घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते तब उसके प्रति उनमें भय या श्रद्धा उत्पन्न हुई और यही धीरे-धीरे आदिम धर्म का रुप लेने लगा। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अलौकिक शक्ति में विश्वास ही धर्म का आधार है। विश्वास के बिना धर्म का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है।

 

उन्नीसवीं यदी के उत्तरार्ध में मि. टायलर ऐसे पहले मानवशास्त्री है, जिन्होंने आदिम धर्म का सिद्धांत बताया। उनका यह सिद्धांत “आत्मावाद“ या जीववाद के नाम से जाना जाता है। टायलर से 1871 में “आदिम संस्कृति नामक पुस्तक में अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया है। उन्होंने पूर्वज (मृतक) पूजा को धर्म का आरंभिक रुप बतलाया तथा समाधि या कब्र को उन्होंने प्रारंभिक पूजा स्थल बतलाया है।19

 

“टोडा“ जनजाति में मृत्यु के पश्चात् संस्कारों में दो प्रकार की अन्तयेष्टि (दाह संस्कार) की जाती है। हरी दाह क्रिया तथा सुखी दाह क्रिया हो एवं कोटा जनजाति में क्रमशः इन दाह संस्कारों को “जगटापा“ तथा वर्लदऊ क्रिया कहते है। ये दोनों सुखीदाह प्रक्रिया है। कोटा में ’पसदऊ’ हरी दाह क्रिया का रुप है।20

           

संथाल परगना में सौरिया पहाड़ी जनजातियों में जीवोत्माओं के लिए स्थानीय शब्द “गोसाईन“ का प्रयोग किया जाता है तथा विभिन्न सुअवसरों व संकट की स्थितियों में इनकी पूजा भी की जाती है। इस प्रकार जनजातियों में धार्मिक संस्कार एक महत्वपूर्ण घटक है। किसी आदिम समाज का वर्णन बिना धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों के नहीं किया जा सकता।

 

“कोरवा“ लोग एक आत्मा को फसलों वर्षा व पशुओं के अधिष्ठात्री के रुप में मानते है। छोटा नागपुर की मूण्डा, ओरांव तथा हो जनजातियां अप्राकृतिक शक्तियों को “बौंगा“ के नाम से पुकारते है। वह कुछ भी प्रतीक हो सकता है, उन्हें यह विश्वास होता है कि आत्माएँ या ये प्रतीक उन्हें संकट से मुक्ति दिलाते है तथा रोगों से मुक्त करते है। इसी तीह यह धर्म के सिद्धांत में मानावाद का उदाहरण है।21

 

नीलगिरी पहाड़ियों के टोडा तथा छोटा नागपुर के हो को अन्तिम संस्कार के पश्चात् से आत्मा की अन्तिम तथा सदा के लिये विदाई को सुनिश्चित करना होता है। टोडा लोग इस प्रकार के दूसरे समारोह से लौटते समय काँटे फैलाते आते हैं ताकि अपकारी प्रेतात्मा उनके ग्राम में प्रवेश न कर सके। बस्तर के मुड़िया लोगों के पास गाँव का एक बड़ा नगाड़ा होता है तथा वे विश्वास करते हैं कि ये उनके प्रमुख देवता लिंगोपेन का निवास है, जो उनके कल्याण की चिन्ता करता है।22           

 

टोटमवाद एवं टेबू:

टोटम अथवा गणचिन्ह का आशय किसी ऐसे भौतिक तत्व (प्राणी, पेड़-पौधे, प्राकृतिक तत्व) से है जिससे किसी एक गोत्र विशेष के लोग (सदस्य) श्रध्दा भक्ति या आदर का भाव रखते हैं एवं समूचा गोत्र समूह, इस तत्व के साथ अपना एक अलौकिक संबंध मानते है।23 टोटम (Totem) शब्द चिपेवा भाषा से लिया गया है। इसका सबसे पहला उल्लेख 1791 में श्रण् स्वदह ने किया। यह उल्लेख उन्होंने तब किया जब वे अमेरिकन इंडियन्स का अध्ययन कर रहे थे। ज्वजमउ टोटम का अंग्रेजी में अनुवाद हैं। इसके अन्य नाम क्वकंपउ (डोडेम) टूडेम (Toodaim) ओटोटेमन (Ototeman) और ओडोडम (Ododem) हैं।24 जनजातीय समूहों में ऐसा माना जाता है कि टोटम से संबंधित वस्तु ने उनके गोत्र के पूर्वजों की सहायता और रक्षा की है। सर्वश्री दुर्खीम महोदय के अनुसारः- टोटम वाद के आधार पर ही पवित्र एवं अन्य सामान्य वस्तुओं के बीच भेद करने की भावना का उदय हुआ। इस प्रकार कहा जा सकता है कि टोटमवाद ही सभी धर्मों का प्राथमिक चरण या स्वरूप है।

 

उरांव जनजाति कई गोत्रों में विभाजित है। उरांव जनजातियों के प्रत्येक गांव का नामकरण टोटम अथवा गण चिन्ह के आधार पर हुआ है। जैसे - टोपो का गण चिन्ह “चिड़िया“ है, लकड़ा का “बाघ“, पन्ना का “लोहा“,  मुंजनी का “पोआ“ खाखा का काला पक्षी। भारत की सभी जनजातियों में टोटम का एक सामान्य विशेषता है।25 इस प्रकार भारतीय जनजातियों में टोटमवाद एक प्रकार से प्रकृति का संरक्षण वाद ही है। जिन वस्तुओं या प्राणियों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधांे को जनजाति अपना टोटम मानती है, उन्हें कभी वे नुकसान नहीं पहुंचाती और स्वयं के प्रति ऐसा मानती भी है कि वह टोटम प्रतीक उनकी रक्षा करता है। टोटम के प्रति यह श्रद्धा भक्ति या भय उस प्रतीक या गणचिन्ह के साथ उनका अलौकिक संबंध जोड़ता है। टोटम से ही जनजातियों में गोत्र का नामकरण, गण चिन्ह, ध्वज प्रतीक, उत्सव, विधि पूर्वक पूजा अर्चना इत्यादि लक्षण टोटमवाद से जनजातियों का संबंध स्थापित करता है।

 

टोटम की तरह टेबू भी अंग्रेजी भाषा का शब्द नहीं है। इसे गेलिनेशियन भाषा से लिया गया है, जहां इसका अर्थ निषिद्ध करना या निषेध है। टेबू शब्द उन सभी प्रति-बंधों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो मौखिक कथन द्वारा ’मत करो’ के रूप में व्यक्त और सामान्यतः कर्मकांडीय व्यवहार से संबद्ध होते हैं। प्रत्येक समाज में वर्जना अथवा निषेधों का प्रचलन देखने को मिलता है। यह वर्जनायें भोज्य पदार्थों, कार्य, यौन सम्बन्धों एवं अन्य मानव व्यवहार से सम्बन्धित हो सकती हैं। सरल समाजों में टोटम को नष्ट करने अथवा खाने पर निषेध है। इसी प्रकार एक ही टोटम अथवा गणचिन्ह मानने वाले सदस्यों के बीच यौन सम्बन्ध अथवा विवाह निषेध है। इस प्रकार टोटम एवं वर्जना अथवा निषेधों में कार्य कारण का सम्बन्ध है।

मध्यप्रदेश के अगरिया जनजाति लौह कार्य करते हैं। लोहे को गलाने का कार्य कुछ विशेष ऋतुओं में सम्पन्न करते हैं- इन दिनों इस जनजाति के पति एवं पत्नी सहवास सम्बन्धी निषेध का पालन करते हैं। क्योंकि इन लोगों का ऐसा विश्वास प्रचलित है कि ऐसा न करने से लौह को गलाने वाली भट्टियाँ फट जायेंगी अथवा ठंडी पड़ जायेंगी। अतः कुछ निषेधों का कार्य उत्पादन को बढ़ाने से भी है। अतः निषेधों का कार्य विपदाओं की रोकथाम भी है। टेबू को आदिम समाज का अलिखित कानून कहा गया है।26

 

शमनवाद:

प्रत्येक जनजातियों में धार्मिक विशेषज्ञ अवश्य पाये जाते हैं। धार्मिक विशेषज्ञ एक से अधिक भी हो सकते हैं। विभिन्न जनजातियों में इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है। बिहार के “हो“ जनजाति के लोग पाहन, मध्यप्रदेश के भारिया भूमिका, गोंड, बैगा, केरल के कनिक्कर प्लाथी व तिब्बत में निवास करने वाली जनजातियों में शामन कहते हैं।27 छत्तीसगढ़ की अनेक जनजातियों में धार्मिक अनुष्ठान, जादू-टोना एवं भूत बाधा जैसी पारलौकिक शक्तियों से संबंधित अनुष्ठानिक कृत्य बैगा द्वारा संपादित किया जाता है। बैगा एक प्रकार से जनजातियों में परंपरागत चिकित्सक और धार्मिक गुरु के रुप में होता है।

 

परंतु अब आुधनिक शिक्षा और वैज्ञानिक सोच - विचार के कारण जनजातियाँ आधुनिक शिक्षा एवं चिकित्सा पद्धति के महत्व को समझने लगी है तथा ओझा, बैंगा और शामन का महत्व इनके बीच अब पहले जैसा नहीं रह गया है।

 

संकट में जनजातीय पहचान-

नैसर्गिक रूप से कुछ विशिष्ट और प्रजातिय विलक्षणताएं होती है, जो एक मानव समूह को जनजातीय पहचान देती है। प्रत्येक जनजाति के अधिकार क्षेत्र में एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है जो अपने लोगों पर एक प्रभावी नियंत्रण स्थापित करता है। उस निश्चित भू-क्षेत्र विशेष पर किसी जनजाति का स्थायी निवास उनका भौगोलिक परिचय देता है।28 आज भी ऐसे कई क्षेत्र हैं, जिनके नाम वहां के निवासी जनजातियों के नाम पर हैं। उत्तर-पूर्व में मिजोरम, नागालैंड तथा त्रिपुरा राज्यों के नाम क्रमशः मिजो, नागा तथा त्रिपुरी जनजातियों पर आधारित हैं। इसी प्रकार, बिहार में सन्थाल परगना, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व आन्ध-प्रदेश के क्षेत्रों में फैले गोंडवाना तथा हिमाचल प्रदेश में लाहौल, स्वांग्ला व किन्नौर क्षेत्रों के नाम क्रमशः वहां के रहवासी सन्थाल, गोंड, लाहौला, स्वांग्ला व किन्नौर जनजातियों के नाम पर आधारित हैं।29

 

भारत में जनजातीय पहचान और उनके वर्गीकरण को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही। सन् 1891 की जनसंख्या रिपोर्ट में जनसंख्या आयुक्त श्री जे. ए. बेन्स ने जातियों को उनके परम्परागत व्यवसाय के आधार पर वर्गीकृत किया। “कृषक व चरवाह जातियों“ की श्रेणी के तहत् उसने “वन्य जनजातियों“ के नाम से एक पृथक उप-शीर्ष बनाया। “वन्य जनजातियों“ के सदस्यों की संख्या लगभग एक करोड़ साठ लाख अनुमानित की गई। सन् 1901 की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें “प्रकृतिवादी“ कहा गया तथा सन् 1911 में उन्हें जनजातीय प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले लोग कहा गया। सन् 1921 की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें “पहाड़ी व वन्य जनजातियों“ का नाम दिया गया तथा उनकी संख्या को लगभग एक करोड़ साठ लाख अनुमानित किया गया। सन् 1931 की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें “आदिम जनजातियां“ कहा गया। भारत सरकार अधिनियम, 1935 में जनजातीय, जनसंख्या को “पिछड़ी जनजातियां“ का नाम दिया गया। सन् 1941 की जनसंख्या रिपोर्ट में उन्हें केवल “जनजातियां“ कहा गया।30

 

संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के अनुसार अनुसूचित जनजाति का तात्पर्य वे जनजातियां अथवा जनजातीय समुदाय अथवा इस प्रकार की जनजातियों अथवा जनजातीय समुदाय के अंशों अथवा समूहों से है जो कि संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत् अनुसूचित जनजातियों के रूप में माने गये हैं। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत् राष्ट्रपति के द्वारा आम सूचना के तहत् अनुसूचित जनजाति को उल्लिखित किया जा सकता है। संविधान में प्रयुक्त अनुसूचित जनजाति शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की खोज में यह कहा जाता है कि संविधायी परिषद में वाद-विवाद के दौरान श्री जयपाल सिंह ने “अनुसूचित जनजाति“ शब्द के बदले ’आदिवासी’ शब्द को प्रयुक्त करने के लिए अपना मत दिया था। लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया था। डा० बी० आर० आंबेडकर, अध्यक्ष संविधान निर्माण समिति द्वारा इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा कि “आदिवासी“ शब्द वास्तव में एक सामान्य शब्द है, जिसमें कोई विशेष वैधानिक विधित अर्थबोध नहीं है। जबकि, “अनुसूचित जनजाति“ शब्द में एक निश्चित अर्थ है, क्योंकि यह जनजातियों को परिगणित करता है।31

 

आदिवासी का अपना मूल धर्म “सरना“ है।32 यह प्रकृति का धर्म है। वह पेड़ों और प्रकृति की पूजा करता है। “तुम कौन हो? पूछे जाने पर वह कहता है “मैं आदिवासी हूँ“। वह अपने जवाब में हिन्दू, मुसलमान या इसाई नहीं कहता। वर्तमान में यदि कोई सबसे बड़ा खतरा आदिवासी समूह को है तो वह उसकी पहचान मिटने का है। जो दिन-ब-दिन विकराल होता जा रहा है। इसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासी मूल धर्म और संस्कृति को विकृत तो किया गया परन्तु अब हिदुत्ववादी संगठनों द्वारा भी घर वापसी के नाम पर “आदिवासी“ मूल निवासी पहचान को “वनवासी“ शब्द विशेषण से अतिक्रमित क्रिया जा रहा है।33 जो उनकी मूल निवासी धरोहर, संस्कृति, और भाषा की पहचान को भविष्य में बदल देगा। “सरना“ धर्म गुरु बंधन तिग्गा कहते है कि “आदिवासी हिन्दू नहीं है।“34

 

गोविंद सदा शिव धुर्वे जनजातियों को एक जाति का प्रकार मानने की बजाय “ पिछड़े हिंदुओं“ की संज्ञा देते हैं। इसके ठीक उलट आदिवासी अकादेमिक वर्जीनियस खाखा मानते हैं कि भारत की जनजातियों को हिंदू नहीं कहा जा सकता। उनका तर्क है कि जनजातियाँ प्राकृतिक धर्म मानती थीं। भले ही उसके कुछ तत्व हिंदू धर्म के तत्वों के सामंजस्य में या समानांतर भी लगें।35

 

एक विचारक वाहरू सोनवडे़ का कहना है कि आदिवासी लोग बिल्कुल हिंदू नहीं हैं और हिंदू कोड बिल आदिवासियों पर लागू नहीं किया जाता।36  

 

आदिवासी विद्वान डॉ. रामदयाल मुंडा ने अपनी पुस्तक में आदिवासियों द्वारा अपने को हिंदू बताने से होने वाले दूरगामी परिणामों की ओर संकेत किया है।37 हिंदुइज्म में शामिल करने की प्रक्रिया पर गहरी आपत्ति लाल सिंह चौहान की भी है। उनका उलट सवाल है कि आदिवासी तो भारत के मूल निवासी हैं।38

 

सन् 1941 में प्रकाशित अपने बहुचर्चित लेख “हिंदू मेथड ऑफ ट्राइबल एब्जॉर्प्शन“ में प्रोफेसर निर्मल कुमार बोस ने उन धीरे-धीरे चलने वाली गहन प्रक्रियाओं का वर्णन किया है, जो प्राचीन काल से ही हिंदू दायरे और आदिवासियों को परस्पर निकट लाने की भूमिका निभाती रही हैं।39

 

छद्म आदिवासीकरण की प्रक्रिया डॉ. हीरालाल शुक्ल के अनुसार, “संस्कृतीकरण के सिद्धांत के विपरीत आज एक नया सिद्धांत “छद्म आदिवासीकरण“ का है, जिसका प्रवाह उच्च से निम्न की ओर है। इस प्रक्रिया के तहत गैर-आदिवासी कतिपय समानताओं के आधार पर आदिवासी होने का दावा करते हैं। यह गैर-आदिवासी अस्मिता का आदिवासी अस्मिता में जुड़ने का भाव है, किंतु इससे वास्तविक आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात हो रहा है।40

 

देश की आबादी के लगभग दस करोड़ आदिवासियों के सामने धर्म भी एक मुद्दा है। बहस काफी पुरानी हो चली है कि आदिवासियों का धर्म कौन-सा है। आदिवासी प्रतिनिधियों का आरोप है कि जनगणना में अथवा चाहे कहीं भी कोई फॉर्म भरने की बात हो, तो धर्म के कॉलम में उन्हें ट्राइबल या एबॉरिजिनल रिलीजन यानी “मूल निवासी धर्म“ चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।41

 

सकारात्मक एवं संरक्षणात्मक प्रयास:

गुमनाम जनजातीय नायकों का भारतीय इतिहास में अविस्मरणीय योगदान रहा है परन्तु उनके साहस और बलिदान की गौरवगाथा इतिहास में छिट-पुट अदिवासी विद्रोह का नाम देकर कहीं दर्ज की गई तो कही की ही नहीं गई।42 राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे जनजातीय योद्धा और जननायकों के ऐतिहासिक अवदान को अनेक बौद्धिक कार्यक्रमों के माध्यम से प्रकाश में लाया जा रहा है।43 संपूर्ण देश में भगवान बिरसा मुण्डा के भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उनके अविस्मरणीय योगदान के साथ ही जनजातीय समृद्ध संस्कृति और जनजातीय विरासत को पहचान देने के लिए 150 वीं जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है।44 जिस राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए  यह शोध पत्र लेखन किया जा रहा है। वह भी इसी स्वर्णिम कार्यक्रम का हिस्सा है। भारत के सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में जनजातीय गौरव तथा जनजातीय लोक संस्कृति पर कार्यशालाएं एवं व्याख्यान मालाएं आयोजित की जा रही है।

 

छत्तीसगढ़ में आदिवासी बहुल बस्तर अन्चल सदियों से अपनी जैव विविधता और जनजातीय सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध रहा है। यहां आदिवसियों की धार्मिक विरासत के रूप में आस्था का केन्द्र देवगुड़ी माता गुड़ी रही है। बस्तर के प्रत्येक गांव में देवगुड़ी- माता गुड़ी पाया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे देव स्थल भी कहा जाता है। जनजातीय समुदायों में आस्था रुपी इन पवित्र स्थलों का महत्वपूर्ण स्थान है।45 इन सभी देवी-देवताओं के बीच शक्ति का प्रतीक बस्तर वासियों को आराध्या देवी माई दंतेश्वरी का प्रमुख स्थान है। फागुन शुक्ल पक्ष के पंचमी को स्थानीय मेनका डाबरा मैदान के मावलीगुड़ी में मां दंतेश्वरी के छत्र व कलश स्थापना के साथ ही 10 दिवसीय फागुन मंडई का आयोजन होता है।46 बस्तर में 75 दिवसीय चलने वाले दशहरा पर्व का भी जनजातीय संस्कृति में सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है।47

 

छत्तीसगढ़ में राज्य शासन द्वारा देवगुड़ी एवं माता गुड़ी को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा स्वीकार करते हुए इनके संरक्षण और संवर्धन किए जा रहे हैं। बस्तर में देवगुड़ी केवल पूजा-अर्चना के स्थल मात्र नहीं है अपितु पारंपरिक, अनुष्ठानों त्यौहारों, पारिस्थितिक संपदा व राज्य की सांस्कृतिक धरोहर के साथ ही जैव विविधता के अद्वितीय केन्द्र भी है। देवगुड़ी-मातागुड़ी स्थल प्राकृतिक संपदा के सरंक्षण के साथ ही वन्य प्राणियों के लिए भी शरणास्थली है।48 राज्य में प्रभुत्व देवगुड़ी स्थलों में भंगाराम, डोकरी माता, गुड़ी  सेमरिया माता, लोहजाड़िन माता गुड़ी, मावली माता गुड़ी, मां दंतेश्वरी गुड़ी और कंचन गुड़ी सम्मिलित है। ऐसे पवित्र स्थलों पर पेड़ काटने और शिकार करने की सख्त मनाही होती है तथा इन देवस्थानों के संरक्षण का प्रयास आस्था के साथ किया जाता है। बस्तर अंचल की आस्था और संस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में 6283 देवगुड़ी और मातागुड़ी में से 3244 के जीर्णोद्धार कह स्वीकृति राज्य शासन द्वारा दी गई है।49 देवगुड़ियों और माता गुड़ियों के साथ ही “गोटुल“ मृतक स्मारकों को उनके नाम से सामुदायिक वनाधिकार मान्यता पत्र जारी किया जाना इन सांस्कृतिक धरोहरों और विरासतों के संरक्षण की दिशा में राज्य शासन की सराहनीय पहल है। छत्तीसगढ़ में बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के कार्या को और अधिक ग्रामीणों तक सुलभ बनाने के लिए बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण की एक अधिकृत वेबसाईट www.tdabastar.cgstate.gov.in तैयार की गई है। जिसका मुख्य उद्देश्य बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों की संस्कृति का परिरक्षण, संवर्धन एवं संरक्षण करना है। साहसिक एवं खेल के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बस्तर में भूमकाल आंदोलन के जनजातीय नायक “गुण्डाधुर“ के सम्मान में गुण्डाधुर राजकीय सम्मान प्रदान किया जाता है।

 

निष्कर्ष: -

भारत को विभिन्न प्रजातियों और जनजातियों के लिए “मेल्टिंग पॉट“ कहा गया है। एक संस्कृति जब दूसरी संस्कृति के सम्पर्क में आती है तो सांस्कृतिक आदान-प्रदान एक सामान्य घटना है। परन्तु जनजातियों के मामले में बदलाव केवल सांस्कृतिक परिवर्तन तक सीमित न रहा अपितु वह प्रजातिय सम्मिश्रण के साथ-साथ शोषण और दमन की विभत्स व क्रूर विभाषिका भी लिए हुए है। आदिवासी भारत के मूल निवासी होने के बावजूद उनका नामकरण भी सही न हो सका कभी उन्हें वन्य जनजातियाँ तो कभी उन्हें पिछड़ी जनजातियाँ पुकारा गया।50

 

हर सदी में आदिवासियों ने अपने सरल होने की कीमत चुकाई है। समृद्ध वन और खनिज सम्पदा के बीच निवास करने वाली इन आदिम जातियों ने सदैव अलगाव और विपन्नता का जीवन जिया है। शारीरिक शोषण की फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि कालान्तर को उनमें नस्लीय विभेद भी उत्पन्न हो गया। इस्लामीकरण, हिन्दुकरण, इसाईकरण के निरन्तर प्रकोप ने जनजातियों के सामाजिक-सांस्कृति ताने-बाने को ही छिन्न-भिन्न कर दिया और आज जनजातियों की पहचान ही संकट में घिरी हुई है। युवागृह जैसी सामाजिक, सांस्कृतिक शिक्षा केन्द्रों के विलुप्तीकरण के साथ ही जनजातियों की धार्मिक परम्पराएँ अपनी अंतिम सांसे गिन रही है।

 

सुझाव:

·       जनजातियों की संस्कृतियों ’धरोहरो’ का संरक्षण किया जाना चाहिए।

·       विकास की धारा से जुड़ चुके आदिवासी समूहों को चाहिए कि वे हासिए पर रह गए आदिवासी साथियों के लिए प्रेरणा पूंज बने।

·       प्राथमिक शिक्षण जनजाति क्षेत्रां मे स्थानीय बोली और भाषा में दी जाकर बचपन से ही जनजातीय सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण के प्रयास किए जाना चाहिए।

·       अलगाव नहीं सद्भाव के साथ आदिवासियों को विकास की धारा में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

·       वन उत्पादों और वन औषधियों के जानकार आदिवासी गुरुओं का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्हें प्रोत्साहित कर ऐसे उत्पादों का संवर्धन तथा प्रसंस्करण केन्द्रों में जनजातीय लोगों की सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

·       बेगार और शोषण के विरुद्ध नियमों का कठोरता पूर्वक पालन किया जाना चाहिए।

·       श्रम कानूनों का पालन सुनिश्चित करते हुए आदिवासी क्षेत्रों में भी दैनिक मजदूरी शासन द्वारा तय की गई अनुसार निजी क्षेत्रों में भी लागू किया जाना चाहिए।

·       जनजातियों के तीज-त्यौहार, मेले-मड़ई, गीत, नृत्य, संगीत के साथ देवगुड़ियों व मातागुड़ियों का संरक्षण व उनका प्रोत्साहन किया जाना चाहिए।

·       पर्यावरणीय मापदण्डों के अनुरूप स्थान्तरित कृषि का विकल्प सहकारी समिति के माध्यम से किया जाना चाहिए।

·       जनजातियों को उनका वास्तविक अधिकार प्राप्त हो इसलिए छद्म आदिवासीकरण को रोका जाना चाहिए।

·       आदिवासियों के मूल धर्म के रूप में “सरना“ आदिवासी धर्म के लिए जनगणना के कॉलम में विकल्प मुहैया किया जाए ताकि उनकी वास्तविक पहचान को सुरक्षित रखा जा सके।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1.    चौबे एवं शर्मा, सामाजिक सांस्कृति मानव विज्ञान, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, 2002, भोपाल, पृ. 101

2.    तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 372

3.    https://egyankosh.ac.in इकाई - 4, जनजातीय धर्म पृ. 50

4.    मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 119

5.    तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 17

6.    हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 151

7.    वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 101

8.    वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 102

9.    हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 03

10.  हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 05

11.  हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 06

12.  हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 09

13.  वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 01

14.  मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 113

15.  मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 113

16.  हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 81

17.  मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 119

18.  मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 122

19.  शर्मा एवं शर्मा, सामाजिक- सांस्कृतिक मानव विज्ञान, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996 पृ. 222-223

20.  मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 135

21.  शर्मा एवं शर्मा, सामाजिक- सांस्कृतिक मानव विज्ञान, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996 पृ. 225

22.  हसनैन, नदीम, जनजातीय भारत, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 1997 पृ. 73

23.  शर्मा एवं शर्मा, सामाजिक- सांस्कृतिक मानव विज्ञान, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996 पृ. 225

24.  उपेन्द्र, सामाजिक मानवशास्त्र, सी.बी.एस. पब्लिशर्स, नई दिल्ली, 1995 पृ. 98

25.  शर्मा एवं शर्मा, सामाजिक- सांस्कृतिक मानव विज्ञान, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996 पृ. 225

26.  मजूमदार एवं मदन, (हिन्दी रुपान्तरण - गोपाल भारद्वाज) सामाजिक मानवशास्त्र, परिचय, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 1997 पृ. 143

27.  शर्मा एवं शर्मा, सामाजिक- सांस्कृतिक मानव विज्ञान, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996 पृ. 228

28.  वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 02

29.  वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 03

30.  वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 07

31.  वर्मा, रुपचंद, भारतीय जनजातियाँ अतीत के झरोखे से, निदेशक, प्रकाश विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1997 पृ. 09

32.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 372

33.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 372

34.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 396

35.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 368

36.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 368

37.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 369

38.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 369

39.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 374

40.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 385

41.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 383

42.  गुप्ता, रमणिका ;मण्कण्द्ध आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह, राधाकृष्ण पेपर बैक्स, दिल्ली, 2022 पृ. 07

43.  गुप्ता, रमणिका ;मण्कण्द्ध आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह, राधाकृष्ण पेपर बैक्स, दिल्ली, 2022 पृ. 05

44.  https://www.dishtiias.com से साभार “जनजातीय गौरव दिवस समारोह“

45.  https://www.Mediapassion.com से साभार “बस्तर की देवगुड़िया और मातागुड़िया हुई लिपि बद्ध“

46.  https://www.naidunia.com>chhattisgarh>Dantewadaसाभार “बस्तर के हर गॉव में देवी - देवता गॉव में देवगुड़ी“

47.  https://hindi.news 18.com बस्तरः धार्मिक सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का प्रतीक, आदिवासी परम्पराओं तके दकवगुड़ी का विशेष महत्व।

48.  https://kelopravah.news>devgudi छत्तीसगढ़ के देवगुड़ी स्थलः आस्था, संस्कृति और जैव विविधता का अनोखा संगम।

49.  https://mediapassion.co.in बस्तर की देवगुड़ियाँ और मातागुड़िया हुई लिपिबद्ध।

50.  तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 365

 

 

Received on 03.03.2026      Revised on 21.03.2026

Accepted on 06.04.2026      Published on 06.06.2026

Available online from June 10, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(2):102-110.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00022

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